खामोश हुई ‘पर्सेपोलिस’ की आवाज: ईरान की बेटियों को दुनिया तक पहुंचाने वाली मार्जान सात्रापी नहीं रहीं

 ईरान की बंदिशों, महिलाओं की लड़ाई और आज़ादी के सपनों को अपनी कलम और कैमरे के जरिए दुनिया के सामने रखने वाली मार्जान सात्रापी अब इस दुनिया में नहीं हैं। 56 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।


पर्सेपोलिस’ के जरिए उन्होंने सिर्फ अपनी कहानी नहीं सुनाई थी, बल्कि उन लाखों महिलाओं की आवाज बनी थीं जिन्हें बोलने का अधिकार तक नहीं मिला। 


मार्जान ने अपने निजी अनुभवों को एक ऐसी वैश्विक कहानी में बदल दिया जिससे दुनिया भर के लोग जुड़ सके। 

जानिए उनके संघर्ष, सिनेमा और विरासत की कहानी।

मार्जान सात्रापी का नाम सिर्फ एक लेखिका या फिल्ममेकर के तौर पर नहीं लिया जाएगा, बल्कि उस महिला के रूप में याद किया जाएगा जिसने ईरान की सच्चाई को दुनिया के सामने बेखौफ रखा। ईरानी-फ्रेंच कार्टूनिस्ट, लेखिका और निर्देशक मार्जान सात्रापी का 56 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर ने दुनियाभर के साहित्य और सिनेमा प्रेमियों को स्तब्ध कर दिया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने दी श्रद्धांजलि

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि फ्रांस ने एक ऐसी कलाकार को खो दिया है जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी। मैक्रों ने कहा कि मार्जान ने अपने निजी अनुभवों को एक ऐसी वैश्विक कहानी में बदल दिया जिससे दुनिया भर के लोग जुड़ सके।

मार्जान का जीवन संघर्ष, निर्वासन और प्रतिरोध की कहानी रहा। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद बदलते ईरान को उन्होंने बेहद करीब से देखा। कट्टरवाद के बढ़ते माहौल के बीच उनके माता-पिता ने उन्हें किशोरावस्था में ऑस्ट्रिया भेज दिया। विदेश में अकेलेपन और पहचान के संघर्ष से जूझने के बाद वह वापस ईरान लौटीं, लेकिन वहां का माहौल उन्हें रास नहीं आया। आखिरकार उन्होंने फ्रांस में बसकर अपनी नई पहचान बनाई।

उस पीढ़ी की दास्तान थी मार्जान जिसने क्रांति, दमन और सपनों के टूटने को अपनी आंखों से देखा। 

दुनिया ने उन्हें सबसे ज्यादा ‘पर्सेपोलिस’ के जरिए जाना। यह सिर्फ एक ग्राफिक नॉवेल नहीं थी, बल्कि उस पीढ़ी की दास्तान थी जिसने क्रांति, दमन और सपनों के टूटने को अपनी आंखों से देखा। इसी किताब पर बनी एनिमेटेड फिल्म ने 2007 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में सम्मान हासिल किया और ऑस्कर तक पहुंची। मार्जान हमेशा कहती थीं कि वह दुनिया को बताना चाहती हैं कि ईरानी लोग भी उसी तरह प्यार करते हैं, सपने देखते हैं और बेहतर जिंदगी की उम्मीद रखते हैं जैसे दुनिया का कोई भी इंसान।

महिलाओं के अधिकारों और लोकतंत्र की लड़ाई

बीते कुछ वर्षों में वह महिलाओं के अधिकारों और लोकतंत्र की लड़ाई की सबसे मजबूत आवाजों में शामिल रहीं। महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में उठे ‘वुमन, लाइफ, फ्रीडम’ आंदोलन का उन्होंने खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कलाकारों और बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर इस आंदोलन की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

पति के निधन के बाद गहरे सदमे में थीं मार्जान

बताया जाता है कि अपने पति और स्वीडिश फिल्म प्रोड्यूसर मैटियास रीपा के निधन के बाद मार्जान गहरे सदमे में थीं। करीबी लोगों का मानना है कि वह इस व्यक्तिगत क्षति से कभी पूरी तरह उबर नहीं सकीं। इसके बावजूद उन्होंने सिनेमा और शिक्षा के क्षेत्र में काम जारी रखा। इसी साल उन्होंने एक फाउंडेशन की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य दुनिया भर के छात्रों को पेरिस में फिल्म शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था।

अपने सिद्धांतों से नहीं किया समझौता

मार्जान सात्रापी ने सम्मानों से भरी जिंदगी जी, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘लीजन ऑफ ऑनर’ को उन्होंने यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि लोकतंत्र और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के समर्थन में दुनिया को और मजबूती से खड़ा होना चाहिए।

आज मार्जान सात्रापी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी किताबें, फिल्में और बेबाक विचार आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाते रहेंगे कि कला सिर्फ मनोरंजन नहीं, बदलाव की सबसे ताकतवर आवाज भी हो सकती है।


रिपोर्ट प्रियांशु कुमार सिंह 







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