❝ जिम्मेदारियों के शोर में कहीं खो गया वो बचपन ❞
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दिल की गलियों में छुपा बचपन
बचपन...
ज़िंदगी का सबसे अनमोल पल, बचपन होता है,
न ग़म की कोई परछाई, न जिम्मेदारियों का बोझ होता है।
होंठों पर हँसी यूँ ही खिल जाया करती थी,
हर छोटी-सी बात दिल को बहलाया करती थी।
अब तो मुस्कुराने की भी वजह ढूँढ़नी पड़ती है,
जाने क्यों ज़िंदगी इतनी उलझनी पड़ती है।
जिम्मेदारियों के साए में दब जाती हैं खुशियाँ,
बड़े होते ही छिप जाती हैं आँखों की सिसकियाँ।
रोने के लिए भी अब वजह बतानी पड़ती है,
और हर ख़्वाहिश कहीं दिल में दबानी पड़ती है।
दिल की बातें दिल में ही रह जाती हैं अक्सर,
खामोशियों का पहरा रहता है हर पल भीतर।
रातें लंबी हो गई हैं, नींद भी रूठ गई,
वक़्त की दौड़ में जाने कितनी खुशियाँ छूट गईं।
बड़े हो गए हम जिम्मेदारियों की राहों में,
बचपन कहीं छिपा है दिल की ही पनाहों में।
मन करता है फिर सिमट जाएँ माँ की बाँहों में,
पर वो सुकून खो गया जाने किन राहों में।
याद आती हैं बचपन की अल्हड़ अठखेलियाँ,
वो बेफ़िक्र हँसी, वो प्यारी-सी शरारतें और सहेलियाँ।
सूनी-सी लगती हैं अब लड़कपन की गलियाँ,
दिल में फिर भी महकती हैं यादों की कलियाँ।
जब थक जाता है मन दुनिया की भीड़-भाड़ से,
जब हारने लगता है खुद अपनी ही पुकार से,
तब कानों में गूँजती हैं बीते दिनों की तानियाँ,
और याद आती हैं बचपन की अल्हड़ अठखेलियाँ।
काश! फिर लौट आए वो सुनहरा ज़माना,
जहाँ हर दिन था अपना और हर पल था सुहाना।
न ग़म का कोई साया था, न जीवन की पहेलियाँ,
बस यादों में रह गईं बचपन की अल्हड़ अठखेलियाँ।
Published by : Priyanshu kumar Singh

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