बात कड़वी है, अगर बोल दूं तो दु:ख लगेगी! बत्ती से लेकर विकास तक हर मोर्चे पर फेल व्यवस्था, जनता लाचार! आखिर कब और कैसे बदलेगी तस्वीर?


सीवान
। देश को प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद देने वाली धरती और बिहार को निर्दलीय मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा जैसा नेता देने वाला महाराजगंज आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और कई बार स्वास्थ्य मंत्री रह चुके मंगल पांडे जैसे बड़े नेताओं से जुड़ी इस राजनीतिक धरती की स्थिति ऐसी हो चुकी है कि यहां बत्ती से लेकर विकास तक हर मोर्चे पर व्यवस्था विफल साबित होती नजर आ रही है।

वादों और आश्वासनों में उलझा महाराजगंज

महाराजगंज की जनता हर मोड़ पर एक ही शिकायत करती नजर आती है कि अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल आश्वासन देने तक सीमित हैं। लोगों का कहना है कि उनकी समस्याओं को सुनने और समाधान करने वाला कोई नहीं है।

स्थानीय विधायक को लेकर भी लोगों में नाराजगी दिखाई देती है। कई लोगों का कहना है कि विधायक केवल सोशल मीडिया पोस्ट और कार्यक्रमों में अधिक नजर आते हैं। जनता की अपेक्षा है कि वे जनता दरबार लगाएं, पंचायत भवनों में समय दें, बिजली, सड़क और अन्य मूलभूत समस्याओं को लेकर अधिकारियों के साथ नियमित समीक्षा बैठक करें। यदि जनप्रतिनिधि सख्ती से सवाल पूछें और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करें, तो क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है।

मेमू ट्रेन की मांग आज भी अधूरी

महाराजगंज के लोगों की वर्षों पुरानी मांग पटना और गोरखपुर के लिए एक जोड़ी मेमू ट्रेन चलाने की रही है, लेकिन यह मांग आज भी अधूरी है। लोगों का मानना है कि यदि इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया गया होता, तो क्षेत्र को बेहतर रेल सुविधा मिल सकती थी।

गांवों में बदहाली, पंचायत व्यवस्था पर सवाल

महाराजगंज के ग्रामीण इलाकों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। कई गांवों में विकास कार्य अधूरे पड़े हैं। लोगों का आरोप है कि कई जनप्रतिनिधि और पंचायत स्तर के जिम्मेदार लोग अपने दायित्वों का पूरी गंभीरता से निर्वहन नहीं कर रहे हैं।

कई स्थानों पर नल-जल योजना में अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो, तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

गांव-गांव में जमीन विवाद बढ़ते जा रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर लोग मारपीट, थाने, कोर्ट-कचहरी और अनुमंडल कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। यदि पंचायत स्तर पर समय पर समाधान हो, तो हजारों लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

पंचायत सचिवों पर भी उठ रहे सवाल

ग्रामीणों का आरोप है कि कई पंचायत सचिव कार्यालयों में नियमित रूप से उपस्थित नहीं रहते। अधूरे विकास कार्यों को पूरा कराने में भी अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई देती और आम लोगों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं सुना जाता।

विकास के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर

सरकार लगातार हाईटेक व्यवस्था, डिजिटल विकास और बेहतर सुविधाओं के दावे करती है, लेकिन महाराजगंज की जमीनी तस्वीर इन दावों से काफी अलग दिखाई देती है। बिजली, सड़क, जल निकासी, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति आज भी कई क्षेत्रों में चिंताजनक बनी हुई है।

एक घंटे की आंधी और 20 घंटे तक बत्ती गुल

महाराजगंज में अक्सर देखा जाता है कि एक घंटे की तेज आंधी न केवल बिजली व्यवस्था को ध्वस्त कर देती है, बल्कि विकास के तमाम दावों की भी पोल खोल देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की स्थिति काफी खराब बताई जाती है। थोड़ी देर की आंधी या बारिश के बाद कई गांवों में 20 से 24 घंटे तक बिजली बहाल नहीं हो पाती।

आखिर जिम्मेदारी कौन लेगा?

सवाल बहुत हैं, लेकिन उन्हें पूछते-पूछते लोग भी थकने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि महाराजगंज की समस्याओं की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा और यहां की जनता कब तक मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करती रहेगी?

हालांकि यह भी सच है कि पहले की तुलना में कई क्षेत्रों में सुधार हुए हैं। फिर भी विकास की रफ्तार और व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। जरूरत इस बात की है कि जनता शालीनता और लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों और समस्याओं को लगातार उठाती रहे, ताकि व्यवस्था जवाबदेह बने और बदलाव की उम्मीद मजबूत हो।

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